#*.झूठ का जाल।।.*#

 अंजान-सी "अंजाम" के डर से घबराकर,

नियत जब झूठ कह जाता है।

बात फिर रूह तक पहुंचती है,
और तब, मन भी बड़ा पछताता है।।

झूठी-झूठी शान बढ़ाकर,
मानव बड़ा इतराता है।
गिर जाता फिर अपनी नजर में
जब‌ उस झूठ की दाग,
अपने ही रूह पर पाता है।।

फिर जागती है उसकी चेतना,
और खुद को वह समझाता है!!!
सत्य है वह जलज जिसपर,
जल का दाग नहीं लग पाता है।
झूठ है वह दीमक जो,
आत्मा को अंदर ही अंदर खाता है।।

झूठ के रचे जाल में फंसकर
कहता उसके अंदर का संसार है।
एक मात्र सत्य मार्ग ही,
रूह की तृप्ति का आधार है।।
✍️✍️
अभिजीत सिंह .......

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