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- सिर्फ इस एक पवित्रता की बात से पास विथ आनर तो नहीं होंगे। लेकिन सेवा में, स्व स्थिति में, सम्पर्क, सम्बन्ध में, याद में, सभी में जो आदि से अब तक अचल हैं, हलचल में नहीं आये हैं, विघ्नों के वशीभूत नहीं हुए हैं। सुनाया ना कि न विघ्नों के वश होना है न स्वयं किसके आगे विघ्न रूप बनना है। इसकी भी मार्क्स जमा होती हैं। एक प्युरिटी, दूसरा अव्यभिचारी याद। याद के बीच में जरा भी कोई विघ्न न हो।
- एक बात- किसी भी प्रकार का हद का लगाव न हो।
- दूसरा- किसी भी प्रकार का स्वयं का स्वयं से वा किसी दूसरे से तनाव अर्थात् खींचातान नहीं हो।
- तीसरा- किसी भी प्रकार का कमजोर स्वभाव न हो।
लगाव, तनाव और कमजोर स्वभाव
- तनाव का कारण है “ मैं-पन''। मैंने यह किया। मैं यह कर सकती हूँ! मैं ही करूँगा! यह जो मैं-पन है, यह तनाव पैदा करता है। “मैं'' यह देह-अभिमान का है।
स्पीड तीव्र करने का आधार है-दूसरे को आगे बढ़ता हुआ देख सदा दूसरे को बढ़ाना ही अपना बढ़ना है।
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