प्रकृति का संदेश* #मानव की विनती
जा.. नहीं उगता धरती पर !
एक दिन बादल भी गरज उठे..
अब ना बरसेंगे तुम पर..
एक दिन पेड़ों ने खाई कसम..
ना देंगे मीठे फल अब हम !
एक दिन हवा भी कुछ ना बोली..
बस चुपके से घोट लिया दम..
और
एक दिन माटी रूठी हम से
बोया जो बीज उगला तन से
बोली, ना दूंगी तुझे जन्म!
ना मिलेगा दूध स्तन से!!
ना लोरी ना काला टीका,
होगा जीवन का सब रंग फीका..
गिरते जा रहे हो अब तुम मेरे मन से..
#मानव की विनती #
जलती दुनिया को बुझा दे..
बुझते दीपक को बचा ले..
सोती किस्मत को जगा दे..
पतझार में फूल खिला ले..
ना रूठ तू गले लगा ले..
ओ माटी, ओ मां ..
दे दे माफ़ी !
घायल है बढ़ते कदम
कर दे तू अब मरहम..
बहता लहू तेरे ही अपनो से..
शर्म लाज हटके अब कफ़नो से..
तू ही बता अब कौन है तेरे सिवा
थाम ले.. उंगली
फिर से जीना सिखा दे!!


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